रात-रात भर जाग जाग कर यों न भोर तू कर ॥

निर्निमेष मत अपनी दृष्टि आकाश ओर तू कर ॥

प्रीति सत्य और अति पुनीत है शंकहीन तेरी ,

पर निरर्थ श्रम चंद्र प्राप्ति का मत चकोर तू कर ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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