ट्रेन की भीड़-भाड़ में धँसे गसा-पस में ॥

होके बेखौफ़ ज़माने से टैक्सी बस में ॥

आप शायद न जानते हों लेकिन ऐसे भी ,

बनते हैं आशिक़ो महबूब ख़ूब आपस में ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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