मुक्तक : 236 – जानता हूँ ये

( चित्र Google Search से साभार ) जानता हूँ ये कि वो निश्चित ही कुछ पथभ्रष्ट है ॥ थोड़ी उच्छृंखल है और थोड़ी बहुत वह धृष्ट है ॥ इतने सब के बाद भी उस पर मेरा पागल हृदय , घोर अचरज…....Read more

मुक्तक : 235 – जितना चाहूँ मैं

( चित्र Google Search से साभार ) जितना चाहूँ मैं रहे चुप वो और भी बमके ॥ बर्क़े याद अब तो साफ़ आस्माँ में भी चमके ॥ रेल के तेज़ गुज़रने पे पुराने पुल सा , उससे मिलने को तड़प धाड़-धाड़...Read more

मुक्तक : 234 – सँकरी गलियों को

सँकरी गलियों को गली चौड़ी सड़क को मैं सड़क ॥ क्यों न लिक्खूँ सच को ज्यों का त्यों बताऊँ बेधड़क ॥ भूले जो काने को काना कह दिया था इक दफ़्आ , अपने दुश्मन हो गए थे ग़ैर पढ़ उट्ठे भड़क...Read more

मुक्तक : 233 – हुस्न में वो

हुस्न में वो पुरग़ज़ब इंसान था ॥ उसका रब जैसा ही कुछ उनवान था ॥ शक्लोसूरत से था मीठी झील पर , फ़ित्रतोसीरत से रेगिस्तान था ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 232 – आज कच्चे ही

आज कच्चे ही सभी पकने लगे हैं ॥ इसलिए जल्दी ही सब थकने लगे हैं ॥ अपने छोटे छोटे कामों को भी छोटे- छोटे भी नौकर बड़े रखने लगे हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

92 : ग़ज़ल – मछलियों का कछुओं का

मछलियों का कछुओं का कोई काल लगता है ।। मुझको वो नहीं चारा एक जाल लगता है ।।1।। घाघ है , बहुत ही है दुष्ट किंतु मुखड़े से , वो नया युवा प्यारा-प्यारा बाल लगता है ।।2।। साधु आजकल कोई भी...Read more