पिंजरे में रह-रहकर सचमुच भूल गया उड़ना ।।

कुछ दिन में तो शायद भूल ही जाऊँगा चलना ।।

जब नामुम्किन ही है आज़ादी तो सोचूँ मैं ,

सीख लिया जाए अब क़ैद में ही खुलकर रहना ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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