मैं बेक़रार हूँ तुम , मुझको क़रार दे दो ।।

नफ़रत तो दी सभी ने , तुम प्यारव्यार दे दो ।।1।।

इन्आम , तमगे मेरा , क्या पेट भर सकेंगे ?

गर हो सके तो मुझको , इक रोज़गार दे दो ।।2।।

चिल्लाते चीखते सब , स्वर मेरे फट गए हैं ,

मेरे गले को सिलने , वीणा के तार दे दो ।।3।।

बच्चे भी बातों बातों , में तानते तमंचे ,

मुझको क़लम बदल के , चाकू कटार दे दो ।।4।।

सूखे ये मिट्टी इससे , ऐ बुततराश पहले ,

इन बिगड़ी मूरतों को , सारे सुधार दे दो ।।5।।

पोशीदा ग़म मेरे सुन , सुनकर न लुत्फ़ ले जो ,

इक राज़दार ऐसा इक ग़मगुसार दे दो ।।6।।

कुछ लोग शौक़ से भी , लेते हैं क़र्ज़ तुमसे ,

मुझको ज़रूरतों की , ख़ातिर उधार दे दो ।।7।।

दीवारें मत दो मुझको , दरवाज़े , खिड़कियाँँ भी ,

बस मुझको तुम अकेली , छत उस्तुवार दे दो ।।8।।

(उस्तुवार=स्थायी/दृढ़ ,बुततराश=मूर्तिकार ,पोशीदा=गुप्त,ग़मगुसार=हमदर्द)

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

 

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