जैसे कि दिल लगा के किताबात तुम पढ़ो ,

कब मेरा हालेदिल मेरी आँखों में पढ़ोगे ?

मेरे तो रोम-रोम में रग-रग में बसे तुम ,

कब मुझको अपने दिल की पनाहों में रखोगे ?

जैसे कि नाम जपते हैं राधा का कन्हैया ,

रटती हैं राधिका भी किशन वंशीबजैया ,

मैं भी तुम्हें उन्हीं की तरह याद हूँ करता ,

क्या तुम भी मुझको ऐसे कभी याद करोगे ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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