हो गए घर-घर पलंग खटिया पुरानी पड़ गई ॥

जबसे छत ढलने लगे टटिया पुरानी पड़ गई ॥

काल ने नख-शिख बदल डाला सकल परिदृश्य का ,

केश लहराने लगे चुटिया पुरानी पड़ गई ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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