शिकंजे यूँ कसे थे मुझपे तिल भर हिल नहीं पाया ।।

हिला तो यों फटा ताउम्र कोई सिल नहीं पाया ।।1।।

मुझे फेंका गया था सख़्त बंजर सी ज़मीनों पर ,

मैं फ़िर भी ऊग बैठा हूँ बस अब तक खिल नहीं पाया ।।2।।

उठाए अपने सर हाथी पहाड़ों से मैं उड़ता हूँ ,

तुम्हारी बेरुख़ी के पंख का चूज़ा न झिल पाया ।।3।।

न हो हैरतज़दा चमड़ी मेरी है खाल गैंडे की ,

वगरना कौन मीलों तक घिसट कर छिल नहीं पाया ।।4।।

मेरे हाथों में वो सब है न हूँ जिसका तमन्नाई ,

हुआ हूँ जबसे हसरत है वो सामाँ मिल नहीं पाया ।।5।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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