क़ुराने पाक ओ-गीता की क़सम खाकर मैं कहता हूँ ॥

जहाँ तक मुझसे बन पड़ता है मैं चुपचाप रहता हूँ ॥

मगर इक हद मुक़र्रर है मेरे भी सब्र की जायज़ ,

न औरों पर सितम ढाऊँ न ख़ुद पर ज़ुल्म सहता हूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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