पहले के ज़माने में तो घर घर थे कबूतर ॥

इंसानी डाकिये से भी बेहतर थे कबूतर ॥

इस दौर में वो ख़त-ओ-किताबत नहीं रही ,

सब आशिक़ों पे ज़ाती नामावर थे कबूतर ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

       

 

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