निकट स्वादिष्ट भोजन के भी उपवासा रखा हमको ॥

विकट दुर्भाग्य ने बरसात में प्यासा रखा हमको ॥

कभी भर दोपहर में जेठ की रेती पे नंगे पग –

अहर्निश हिम पे कितने पूस नागा सा रखा हमको ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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