मछलियों का कछुओं का कोई काल लगता है ।।

मुझको वो नहीं चारा एक जाल लगता है ।।1।।

घाघ है , बहुत ही है दुष्ट किंतु मुखड़े से ,

वो नया युवा प्यारा-प्यारा बाल लगता है ।।2।।

साधु आजकल कोई भी हो ध्यान जब करता ,

मुझको जाने क्यों बगुला या विडाल लगता है ।।3।।

तुम हथेलियों पर सरसों जमाने आए हो ,

पल में कैसे हो जाए जिसमें साल लगता है ।।4।।

जो लुटाने तत्पर हो प्यार देश पर अपना ,

दृष्टि में सभी की माई का लाल लगता है ।।5।।

” उम्र भर गुनह कोई किसने ना किया बोलो ?”

मुझको फ़ालतू जैसा ये सवाल लगता है ।।6।।

वक़्त पर खदेड़ा है गाय ने भी शेरों को ,

यों अजीब सुनने में ये क़माल लगता है ।।7।।

वो प्रतीति देता तलवार सी कभी मुझको ,

औ’ कभी-कभी निस्संदेह ढाल लगता है ।।8।।

( बाल = बालक , विडाल = बिल्ली )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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