मुक्तक : 258 – ये उसी की रज़ा

ये उसी की रज़ा थी इतना कामयाब हुआ ॥ सब उसी की दुआ से मुझको दस्तयाब हुआ ॥ क्यों मुनादी न करूँ जबकि कम ही कोशिश में , जिसकी उम्मीद न थी सच वो मेरा ख़्वाब हुआ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 257 – अतिशय विनम्र था

अतिशय विनम्र था तनिक अशिष्ट हो गया ॥ पाकर के उनका प्रेम रंच धृष्ट हो गया ॥ मित्रों में मेरी पूछ-परख पहले नहीं थी , अब शत्रुओं में भी मैं अति-विशिष्ट हो गया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 256 – बात सारी दिल

बात सारी दिल की दिल में रख न बाहिर कर ॥ दोस्तों में भी कमी अपनी न ज़ाहिर कर ॥ नीम रख दिल में मगर होठों पे रसगुल्ले , काम तो कर बात में भी ख़ुद को माहिर कर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 255 – तलाशे वफ़ा में

तलाशे वफ़ा में जो हम घर से निकले ॥ हवेली महल झोपड़ी देखे किल्ले ॥ वफ़ा आश्नाई में इंसाँ से ज़्यादा , लगे आगे सच सारे कुत्तों के पिल्ले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 254 – उसमें भरपूर

उसमें भरपूर जवानी में भी ग़ज़ब बचपन ॥ बाद शादी के भी पैवस्त धुर कुँँवारापन ॥ उसकी चख़चख़ ग़ज़ल है चीख़ कुहुक कोयल की , बाद सालों के भी लगती है हाल की दुल्हन ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 253 – अरमान धराशायी

अर्मान धराशायी हो जाएँ चाहे सारे ॥ मझधार निगल जाये नैया सहित किनारे ॥ फंदा गले में अपने हाथों से न डालूँगा , तब तक जिऊँँगा जब तक ख़ुद मौत आ न मारे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more