कोई न काम-धाम जो करता दिखाई दे ।।

हर शख़्स सिर्फ़ ख़्वाब ही तकता दिखाई दे ।।1।।

क़ाबिज़ है अफ़रा-तफ़री का माहौल हर तरफ़ ,

जो भी टहल रहा था वो भगता दिखाई दे ।।2।।

हैराँ हूँ डाकुओं के लुटेरों के गाँव में ,

हर कोई आज भीख ही मँगता दिखाई दे ।।3।।

उस नाजनीं का मुझको रिझाने के वास्ते ,

अब भी दुपट्टा गिरता-सरकता दिखाई दे ।।4।।

देता था जो वतन पे कभी अपनी जान को ,

शादी के बाद मौत से बचता दिखाई दे ।।5।।

हर कोई है फिराक में कालिख को पोतने ,

कोई कहीं न प्यार को रँगता दिखाई दे ।।6।।

डॉ. हीरालाल प्रजापति

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