मुक्तक : 243 – जिसे मिलना न था

जिसे मिलना न था इक बार बारंबार पाता है ॥ जो फूटी आँख ना भाए मेरा दीदार पाता है ॥ करिश्मा उसकी क़िस्मत का मेरी तक़्दीर का धोख़ा , वो मेरा क़ाबिले नफ़रत मुझी से प्यार पाता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 241 – कोई आशा की

कोई आशा की किरण सम्मुख न हो ॥ दुःख भरा हो उसमें किंचित सुख न हो ॥ कितना भी हो कष्टप्रद जीवन…. युवा , आत्महत्या को कभी उन्मुख न हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more