मुक्तक 247 : पीतल के ही

पीतल के ही मिलते हैं बमुश्किल खरीददार ॥ इस शह्र में सोने की  मत लगा दुकान यार ॥ अब अस्ल का तो जैसे रहा ही न कामकाज , नकली का फूल फल रहा हर जगह कारबार ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

94 : ग़ज़ल – जब रहता हूँ मैं फ़ुर्सत

जब रहता हूँ मैं फ़ुर्सत या फिर बेकार ॥ तब करता हूँ कविताएँ अपनी तैयार ॥ रहता हूँ मस्रूफ़ तो रहती सेहत ठीक , फुर्सत पाते ही पड़ जाता हूँ बीमार ॥ ख़्वाबों में उसके डूबा रहता हर आन , जिससे करता...Read more