जब रहता हूँ मैं फ़ुर्सत या फिर बेकार ॥

तब करता हूँ कविताएँ अपनी तैयार ॥

रहता हूँ मस्रूफ़ तो रहती सेहत ठीक ,

फुर्सत पाते ही पड़ जाता हूँ बीमार ॥

ख़्वाबों में उसके डूबा रहता हर आन ,

जिससे करता हूँ इक तरफ़ा सच्चा प्यार ॥

तालाबों, नदियों , कूपों को क्यों दूँ बूँद ,

रेगिस्तानों में करता हूँ मैं बौछार ॥

नाउम्मीदी कितनी हो , कितना हो यास ,

मरने का हरगिज़ ना करता सोच-विचार ॥

भीतर से हूँ पूरा शहरी तू मत मान ,

बस ऊपर से ही दिखता हूँ ठेठ गँवार ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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