मुक्तक : 249 – मैंने नापा है

मैंने नापा है निगाहों में उसकी अपना क़द ।। एक बिरवे से हो चुका वो ताड़ सा बरगद ।। वो तो कब से मुझे मंजिल बनाए बैठा है , चाहिए मुझको भी अब उसको बना लूँ मक़्सद ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

95 : ग़ज़ल – हमको परखना ही हो

हमको परखना ही हो तो हँसकर के देखना ।। पक्की कसौटियों पे न कसकर के देखना ।।1।। आए हैं शब-ओ-रोज़ ही हम ज़ह्र फाँकते , आए न एतबार तो डसकर के देखना ।।2।। ना तू ही जिन्न और न अलादीन मैं...Read more