हमको परखना ही हो तो हँसकर के देखना ।।

पक्की कसौटियों पे न कसकर के देखना ।।1।।

आए हैं शब-ओ-रोज़ ही हम ज़ह्र फाँकते ,

आए न एतबार तो डसकर के देखना ।।2।।

ना तू ही जिन्न और न अलादीन मैं कोई ,

नाहक है फिर चिराग़ को घसकर के देखना ।।3।।

सूरज की रोशनी में तो चंदा भी है बुझा ,

जुगनूँ की चौंध दिन में तमस कर के देखना ।।4।।

रहते हैं चुप पर आता है हमको भी बोलना ,

चाहो मुबाहसा-ओ-बहस कर के देखना ।।5।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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