मुक्तक : 251 – क्यों दूर की बुलंदी

क्यों दूर की बुलंदी दिखती खाई पास से ॥ क्यों क़हक़हों से बाँस सुबकते हैं घास से ॥ क्या यक-ब-यक हुआ कि तलबगार खुशी के , पाकर खुशी भी हो रहे उदास उदास से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 250 – सीधी नहीं

सीधी नहीं मुझे प्रायः विपरीत दिशा भाये ॥ मैं चमगादड़ नहीं किन्तु सच अमा निशा भाये ॥ क्यों संतुष्ट तृप्त अपने परिवेश परिस्थिति से ? मुझको कदाचित नीर मध्य मृगमार तृषा भाये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more