उसको फँसा के ख़ुद को , तुमने लिया छुड़ा है ।।

अच्छा किया है तुमने , जो भी किया बुरा है ।।1।।

कुछ बात तो है वर्ना यूँ ही न शह्र का हर-

इक शख़्स आप ही पर उँगली उठा रहा है ।।2।।

मज़दूर के पसीने की खूँ की क्यों हो क़ीमत ,

वो ख़ुद ही मानता , वो पानी बहा रहा है ।।3।।

पुरनम नहीं हैं आँखें , पर ग़मज़दा हैं दोनों ,

इक अश्क़ पी गया है , इक अश्क़ ढा चुका है ।।4।।

मंजिल न थी मेरी ये , क़ाबिल भी मैं न इसके ,

ये तो मुक़ाम मैंने , क़िस्मत से पा लिया है ।।5।।

सब जानते हैं अच्छा , क्या और क्या बुरा है ,

करते हैं सब बुरा तब , जब दिखता फ़ायदा है ।।6।।

शहरों में ही नहीं बस , माहौल शोरगुल का ,

गाँवों में भी तो हल्ला-गुल्ला मचा हुआ है ।।7।।

राहों के धुप अँधेरों , और तेज़तर हवा में ,

टिकती नहीं मशालें , तो फिर चिराग़ क्या है ?8।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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