मुक्तक : 254 – उसमें भरपूर

उसमें भरपूर जवानी में भी ग़ज़ब बचपन ॥ बाद शादी के भी पैवस्त धुर कुँँवारापन ॥ उसकी चख़चख़ ग़ज़ल है चीख़ कुहुक कोयल की , बाद सालों के भी लगती है हाल की दुल्हन ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 253 – अरमान धराशायी

अर्मान धराशायी हो जाएँ चाहे सारे ॥ मझधार निगल जाये नैया सहित किनारे ॥ फंदा गले में अपने हाथों से न डालूँगा , तब तक जिऊँँगा जब तक ख़ुद मौत आ न मारे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

97 : ग़ज़ल – मैं भी अजब

मैं भी अजब तरह की बुराई में पड़ा हूँ  ।। दुश्मन से प्यार वाली लड़ाई में पड़ा हूँ  ।।1।। छूते बुलंदियों को उधर अर्श की सब ही , मैं अब भी तलहटी में , तराई में पड़ा हूँ  ।।2।। दिन-रात...Read more