मैं भी अजब तरह की बुराई में पड़ा हूँ  ।।

दुश्मन से प्यार वाली लड़ाई में पड़ा हूँ  ।।1।।

छूते बुलंदियों को उधर अर्श की सब ही ,

मैं अब भी तलहटी में , तराई में पड़ा हूँ  ।।2।।

दिन-रात मैं जहाँ को बुरा कहता न थकता ,

है वज़्ह कोई यों न ख़ुदाई में पड़ा हूँ  ।।3।।

मेरी ख़ता नहीं तेरे धक्कों के करम से ,

गड्ढों में मैं कभी ; कभी खाई में पड़ा हूँ  ।।4।।

खाई है सर्दियों में क़सम से वो लू मैंने ,

मौसम में गर्मियों के रजाई में पड़ा हूँ  ।।5।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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