97 : ग़ज़ल – मैं भी अजब

मैं भी अजब तरह की बुराई में पड़ा हूँ  ।। दुश्मन से प्यार वाली लड़ाई में पड़ा हूँ  ।।1।। छूते बुलंदियों को उधर अर्श की सब ही , मैं अब भी तलहटी में , तराई में पड़ा हूँ  ।।2।। दिन-रात...Read more

96 : ग़ज़ल – उसको फँसा के

उसको फँसा के ख़ुद को , तुमने लिया छुड़ा है ।। अच्छा किया है तुमने , जो भी किया बुरा है ।।1।। कुछ बात तो है वर्ना यूँ ही न शह्र का हर- इक शख़्स आप ही पर उँगली उठा...Read more

मुक्तक : 252 – सब हुए अत्याधुनिक

सब हुए अत्याधुनिक तू अब भी दकियानूस क्यों ? सबकी चीते जैसी चालें तेरी अब भी मूस क्यों ? ना सही अंदर से ऊपर से तो दिख शहरी यहाँ , सब हैं अप-टू-डेट इक तू ही मिसाले हूश क्यों ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 251 – क्यों दूर की बुलंदी

क्यों दूर की बुलंदी दिखती खाई पास से ॥ क्यों क़हक़हों से बाँस सुबकते हैं घास से ॥ क्या यक-ब-यक हुआ कि तलबगार खुशी के , पाकर खुशी भी हो रहे उदास उदास से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 250 – सीधी नहीं

सीधी नहीं मुझे प्रायः विपरीत दिशा भाये ॥ मैं चमगादड़ नहीं किन्तु सच अमा निशा भाये ॥ क्यों संतुष्ट तृप्त अपने परिवेश परिस्थिति से ? मुझको कदाचित नीर मध्य मृगमार तृषा भाये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 249 – मैंने नापा है

मैंने नापा है निगाहों में उसकी अपना क़द ।। एक बिरवे से हो चुका वो ताड़ सा बरगद ।। वो तो कब से मुझे मंजिल बनाए बैठा है , चाहिए मुझको भी अब उसको बना लूँ मक़्सद ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more