95 : ग़ज़ल – हमको परखना ही हो

हमको परखना ही हो तो हँसकर के देखना ।। पक्की कसौटियों पे न कसकर के देखना ।।1।। आए हैं शब-ओ-रोज़ ही हम ज़ह्र फाँकते , आए न एतबार तो डसकर के देखना ।।2।। ना तू ही जिन्न और न अलादीन मैं...Read more

मुक्तक : 248 – बात बात पर रो पड़ना

बात बात पर रो पड़ना मेरा किर्दार नहीं ।। जिस्म भले कमजोर रूह हरगिज़ बीमार नहीं ।। बचपन से ही सिर्फ चने खाए हैं लोहे के , नर्म-मुलायम कभी रहा अपना आहार नहीं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक 247 : पीतल के ही

पीतल के ही मिलते हैं बमुश्किल खरीददार ॥ इस शह्र में सोने की  मत लगा दुकान यार ॥ अब अस्ल का तो जैसे रहा ही न कामकाज , नकली का फूल फल रहा हर जगह कारबार ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

94 : ग़ज़ल – जब रहता हूँ मैं फ़ुर्सत

जब रहता हूँ मैं फ़ुर्सत या फिर बेकार ॥ तब करता हूँ कविताएँ अपनी तैयार ॥ रहता हूँ मस्रूफ़ तो रहती सेहत ठीक , फुर्सत पाते ही पड़ जाता हूँ बीमार ॥ ख़्वाबों में उसके डूबा रहता हर आन , जिससे करता...Read more

मुक्तक : 246 – विष्णु न होकर

विष्णु न होकर लक्ष्मी की अभिलाषा अनुचित है ।   राम हो तो सीता का मिलना यत्र सुनिश्चित है – तत्र सभी अंधे बटेर मन में पाले रखते , शूर्पनखाओं को केवल लक्ष्मण ही इच्छित है !  -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 245 – चीख चिल्लाहट है

चीख चिल्लाहट है कर्कश कान फोड़ू शोर है ॥ इस नगर में एक भागम भाग चारों ओर है ॥ सुख की सारी वस्तुएँ घर घर सहज उपलब्ध हैं , किन्तु जिसको देखिये चिंता में रत घनघोर है ॥ -डॉ. हीरालाल...Read more