मुक्तक : 295 – ऊँछती है मेरी

ऊँछती है मेरे बालों को अपनी पलकों से ॥ झाड़ती है माँ मेरी धूल अपनी अलकों से ॥ कैसे हो जाऊँ उसकी आँख से ओझल उसको , चैन आता है नित्य मेरी सतत झलकों से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 294 – पाँवों के होते

पाँवों के होते हाथों से बढ़ना सही नहीं ॥ दुनिया मिटा के जन्नतें गढ़ना सही नहीं ॥ बेहतर है आदमी ज़मीं पे ही करे बसर , छत छोड़ आस्मान पे चढ़ना सही नहीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 293 – जब तक थे

जब तक थे तेरे ख़्वाबों ख़यालों में खोये से ॥ जागे हुए भी हम थे जैसे सोये-सोये से ॥ ठोकर ने तेरी नींद तो उड़ा दी हाँ मगर , हँसते हुए भी लगते अब तो रोये-रोये से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 292 – लायक नहीं वो माना

लायक नहीं वो माना ‘तू’ के भी पर ‘आप’ बोल ॥ बच्चा है फिर भी उसको अपना माई-बाप बोल ॥ गर्दन दबी है तेरी उसके पाँव में इस वक़्त , बेहतर है उसके पाप मत अभी तू पाप बोल ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 291 – न तिनका है न

न तिनका है न कश्ती है न इक पतवार अपना है ॥ चलो अब डूब जाने में ही बेड़ा पार अपना है ॥ यूँ लाखों से है पहचान और हज़ारों से मुलाक़ातें , मगर क्या फ़ाइदा इक भी न सच्चा यार अपना है ॥ -डॉ....Read more

मुक्तक : 290 – न हाथ मिलाया न

न हाथ मिलाया न लिपटकर चला गया ॥ यों ही मिले बग़ैर पलटकर चला गया ॥ वादा किया था जिसने उम्र भर के साथ का , दो दिन में अपनी बात से नट कर चला गया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more