वो मुझसे सरेआम औ’ अकेले भी मिलती है ॥

पाते ही मेरे दीद मोगरे सी खिलती है ॥

लेकिन मेरे इजहारे मोहब्बत पे जाने क्यों ,

मौजों में पड़ी डूबती कश्ती सी हिलती है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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