रेग भी प्यासे को जैसे आब सा आता नज़र ॥

एक क़त्रा भी बड़े तालाब सा आता नज़र ॥

यूँ ही मेरी आँखों को सच इन दिनों में रातों को ,

जुगनूँ चौदहवीं का इक महताब सा आता नज़र ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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