न तिनका है न कश्ती है न इक पतवार अपना है ॥

चलो अब डूब जाने में ही बेड़ा पार अपना है ॥

यूँ लाखों से है पहचान और हज़ारों से मुलाक़ातें ,

मगर क्या फ़ाइदा इक भी न सच्चा यार अपना है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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