अपनी कविताओं में मैं अपनी व्यथा कहता रहा ।।

लोग मेरे सच को समझे मैं कथा कहता रहा ।।1।।

मैं न चिंघाड़ा-दहाड़ा तब तलक हर मेमना ,

मुझको इक कुत्ता-सुअर-बकरा-गधा कहता रहा ।।2।।

हर जतन जिसने किया मुझको डुबोने का मैं उस ,

दोस्त को फिर-फिर उबरकर नाख़ुदा कहता रहा ।।3।।

जब तलक दुनिया है क्या मुझको समझ आयी नहीं ,

अच्छे को अच्छा बुरे को मैं बुरा कहता रहा ।।4।।

ख़ुदकुशी करने से क्या रोका उसे ताज़िन्दगी ,

मेरे इस एहसाँ को उलटे वो ख़ता कहता रहा ।।5।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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