जितना भी हैं कमाते ,सब क़र्ज़ को चुकाने ।।

रक्खे हैं ख़ुद को ज़िंदा ,बस फ़र्ज़ ही निभाने ।।1।।

हम जानते हैं पीना ,इक हद तलक सही है ,

पर इस क़दर हैं पीते ,अपना जिगर जलाने ।।2।।

उनने न जाने कैसा ,फूँका भड़क उठी वो ,

वैसे वो आए थे सच ,उस आग को बुझाने ।।3।।

मत मान तू बुरा जो ,मैं दिल नहीं दिखाता ,

अपनों से भी तो पड़ते हैं ,राज़ कुछ छिपाने ।।4।।

उसके लिए भी थोड़ा ,सा वक़्त छोड़ रखना ,

बहुत उम्र अभी पड़ी है ,खाने भी औ’ कमाने ।।5।।

बेदर्द ने यूँ दिल को ,कुचला ,मरोड़ा ,तोड़ा ,

क़ाबिल न छोड़ा दोबाराऔर से लगाने ।।6।।

है मुफ़्त में भी शायद ,अपनी तो जान महँगी ,

आया न कोई मरते ,थे जब इसे बचाने ।।7।।

सच ही वो जानी दुश्मन ,इतना है खूबसूरत ,

जी मचले उसको अपना ,तो दोस्त ही बनाने ।।8।।

डॉ. हीरालाल प्रजापति

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