सच्चाई-हक़ीक़त से मुँह को फेर-मोड़कर ॥

हर फ़र्ज़-ज़िम्मेदारी से रिश्ते ही तोड़कर ॥

सालों से लाज़मी थी इक तवील नींद सो ,

आँखें ही मूँद लीं हरेक फ़िक्र छोडकर ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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