ऐसा नहीं कि हमको आता नहीं लगाना ।।

पर चूक-चूक जाए  है आज ही निशाना ।।1।।

नादाँँ अगर न होते तो बद को बद न कहते ,

अब किस तरह मनाएँ नाराज़ है ज़माना ?2।।

जब तक न की थी हमने ‘हाँ ‘वो मना रहे थे ,

तैयार देख हमको करने लगे बहाना ।।3।।

इतनी दफ़्आ हम उनसे सच जैसा झूठ बोले ,

अंजाम आज का सब सच उसने झूठ माना ।।4।

इक बार आज़माइश हमने न की है उनकी ,

जब जब भी उनको परखा पाया वही पुराना ।।5।।

महफ़िल में अपनी-अपनी कहने में सब लगे हैं ,

सुनने न कोई खाली कहने से क्या फ़साना ?6।।

इस फ़िक्र में कि अपना क्या होगा ज़िंदगी में ,

हम भूल ही चुके हैं क्या हँसना क्या हँसाना ?7।।

कहता  है हिज्र में ही रहता है प्यार ज़िंदा ,

महबूब मुझसे शादी को इसलिए न माना ।।8।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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