मुक्तक : 353 – मेरे ग़रीबख़ाने पे

मेरे ग़रीबख़ाने पे दीवाने ख़ास में ॥ बिलकुल दुरुस्त-चुस्त औ’ होशो-हवास में ॥ क्या हो गया जो मिलते थे बुर्क़े में दूर से , पास आ रहे हैं आज कम से कम लिबास में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 352 – कैसा पागल

कैसा पागल बादल है कहता है प्यासा हूँ ? क्यों लबरेज़ समंदर बोले खाली कासा हूँ ? किसके खौफ़ से आज बंद हैं मुँह बड़बोलों के ? भारी भरकम टन ख़ुद को कहता है माशा हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 351 – आस-विश्वास

आस-विश्वास मारे जा रहे हैं ॥ आम-ओ-ख़ास मारे जा रहे हैं ॥ पहले ख़ुशबू ही देते थे मगर अब , फूल सब बास मारे जा रहे हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 350 – वो जबसे ही कुछ

वो जबसे ही कुछ दूर जाने लगे ॥ ख़यालों में तबसे ही छाने लगे ॥ नहीं लगते थे कल तलक अच्छे अब , वही सबसे ज़्यादा लुभाने लगे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 349 – सख़्त ख़ल्वत में

सख़्त ख़ल्वत में भयानक जले -कटे जैसी ॥ चील सी गिद्ध सी बाज और गरुड़ के जैसी ॥ जबसे महबूब उठा पहलू से मेरे तबसे , मैं हूँ नागिन तो रात मुझको नेवले जैसी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more