चाहत के कुछ मुताबिक़ , करने नहीं वो देता ।।

पानी को रोक रखता , बहने नहीं वो देता ।।1।।

मैं आस्माँ के ऊपर , तालिब हूँ देखने का ,

मेरी झुकी नज़र को , उठने नहीं वो देता ।।2।।

आज़ाद हूँ मैं जैसा , जी चाहे झूठ बोलूँ ,

सच झूठ-मूठ में भी , कहने नहीं वो देता ।।3।।

जब तक खड़े हैं चलने , को मारता है कोड़े ,

चलने लगो तो आगे , बढ़ने नहीं वो देता ।।4।।

करता है यों हुक़ूमत , अपने सिवा किसी को ,

टुक बादशाह भरसक बनने नहीं वो देता ।।5।।

मुमकिन न रह गया है , अब उसके साथ रहना ,

देता है दम-ब-दम ग़म , हँसने नहीं वो देता ।।6।।

मरहम नहीं लगाता , उलटे कुरेदता है ,

हर हाल ज़ख्म मेरे , भरने नहीं वो देता ।।7।।

हरगिज़ नहीं हूँ यारों , मैं बाँझ पेड़ लेकिन ,

गुंचों को नोचकर ही , फलने नहीं वो देता ।।8।।

रखता है मुझ पर इतनी , तो बंदिशें लगाकर ,

ख़्वाबों को ख़्वाब तक में , तकने नहीं वो देता ।।9।।

ये ज़िन्दगी नहीं है , हरगिज़ अज़ीज़ मुझको ,

जीता हूँ क्योंकि सचमुच , मरने नहीं वो देता ।।10।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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