शिक्षा के मंदिर थे जो आलय भी नहीं रहे ॥

शिक्षक पूर्वकाल से गरिमामय भी नहीं रहे ॥

दोहा ‘ गुरु-गोविंद खड़े दोऊ…..’ का व्यर्थ हुआ ,

शिक्षक के विद्यार्थियों में भय भी नहीं रहे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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