बर्बाद मेरी हस्ती को सँवार दिया था ॥

यों डूबती कश्ती को पार उतार दिया था ॥

मुझ जैसे गिरे क़ाबिले-नफ़रत को उठा जब ,

मजनूँ को जैसे लैला वाला प्यार दिया था ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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