कैसा पागल बादल है कहता है प्यासा हूँ ?

क्यों लबरेज़ समंदर बोले खाली कासा हूँ ?

किसके खौफ़ से आज बंद हैं मुँह बड़बोलों के ?

भारी भरकम टन ख़ुद को कहता है माशा हूँ ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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