मुक्तक : 359 – कब वो मेरा है मेरे

कब वो मेरा है मेरे हुस्न का फ़िदाई है ।। उसको बस जिस्म से ही मेरे आश्नाई है ।। ख़ूबसूरत रहूँगी तब ही तक वो चाहेगा , मानूँ न मानूँ वलेकिन यही सचाई है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 358 ( B ) – चलती गाड़ी के लिए

चलती गाड़ी के लिए लाल सी झंडी होगा ।। बर्फ़ उबलता वो ; चाय फ़ीकी औ’ ठंडी होगा ।। अजनबी है वो मगर मुझको लगता चेहरे से , उसके जैसा न कोई दूजा घमंडी होगा ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 358 – तमाम जद्दोजहद

  क़ाफ़ी जद्दोजहद के मुश्किलों के बाद मिला ।। तीखी कड़वाहटों के बाद मीठा स्वाद मिला ।। अपनी तक़्दीर कि लाज़िम जो जब भी हमको रहा , उससे कम ही हमेशा पाया कब ज़ियाद मिला ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति  Read more

■ मुक्तक : 357 – ख़ुशहाल दिल को

( चित्र Google Search से साभार ) ख़ुशहाल दिल को जब्रन नाशाद करके रोऊँ ।। आबाद ज़िंदगानी बर्बाद करके रोऊँ ।। क्या हो गया है मुझको उस सख़्त-बेवफ़ा को , मैं क़ब्र में पहुँचकर भी याद करके रोऊँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

■ मुक्तक : 356 ( B ) – इष्ट मित्र ?

पंक में खिलते कमल को मानते हो अति पवित्र ।। जंगली पुष्पों में भी तुम सूँघते फिरते हो इत्र ।। किन्तु जिसने झोपड़ी में यदि लिया होता है जन्म , हिचकिचाते क्यों बनाने में उसे तुम इष्ट मित्र ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 356 – तू काट कर भी

तू काट कर भी रख दे मेरे पाँव मैं मगर , पूरा करूँगा जिसपे चल पड़ा हूँ वो सफ़र ॥ राहों को भर दे चाहे तू नुकीले काँटों से , मज़्बूत इरादों से बढ़ूँगा मैं वो रौंदकर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more