कब सबके सपने सच होते ?

पर खाएँ इनमें सब गोते ।।1।।

जो बेवज्ह ही हँसते अक़्सर ,

उनमें झरते ग़म के सोते ।।2।।

‘मत फँसना , मत फँसना’ रटते ,

जाल फँसे सब अहमक़ तोते ।।3।।

आम नहीं वो पाते हैं जो ,

झाड़ करील-बबूल के बोते ।।4।।

जिनको बस दर्दोग़म मिलते ,

ऐसे लोग बहुत कम रोते ।।5।।

ख़ुद का बोझा ही कब उठता ?

सब अपने अपने ग़म ढोते ।।6।।

तारी मैल ज़मीरों पर हो ,

लेकिन लोग बदन भर धोते ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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