॥ तुम निर्मल मल ग्रसित जगत मन ,पावन कर दो मैया ॥

॥ हर  लो  सब  मन  की  विकृतियाँ , जीवन भर को मैया ॥’

तीनों तापों से जलती दुनिया मैया आग बुझाओ ॥

औंधे मुँह सब लोग पड़े हैं आके आप उठाओ ॥1॥

तीनों तापों से जलती दुनिया………………..

काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर में सभी फिरते हैं ।

स्वार्थ मगन दुनिया वाले मतलब को उठे गिरते हैं ।

विषय वासनाओं के दल दल से मन प्राण बचाओ ॥2॥

तीनों तापों से जलती दुनिया………………….

यह संसार असत या सत है मन में सभी ये भ्रम है ।

द्वैत अद्वैत की खींचातानी व्यर्थ सभी ये श्रम है ।

मूरख हैं सब आकर इनको तत्व ज्ञान समझाओ ॥3॥

तीनों तापों से जलती दुनिया…………………..

मन से वचन से तेरी जहाँ में भक्ति कहाँ सब करते ?

दुष्ट अनिष्ट की आशंका वश ढोंग यहाँ सब करते ।

हेतु रहित अनुराग आप पद सबका आज लगाओ ॥4॥

तीनों तापों से जलती दुनिया……………………

राम कहाँ रावण को जीत सकते थे शक्ति बिन तेरी ?

और कहाँ मिल सकती थी वह शक्ति भक्ति बिन तेरी ?

अपनी शक्ति का फिर से जग को चमत्कार दिखलाओ ॥5॥

तीनों तापों से जलती दुनिया…………………..

कलियुग में तेरा नाम काम तरु मनवांछित फल दाता ।

दुःख दुकाल दारिद्र्य दोष सब तेरी दया से जाता ।

इस संसार की सब विपदाएँ मैया शीघ्र हटाओ ॥6॥

तीनों तापों से जलती दुनिया……………………

औंधे मुँह सब लोग पड़े हैं………………………

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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