मुक्तक : 391 – यहाँ से कहीं और

यहाँ से कहीं और को जाइएगा ।। मेरे आगे मत हाथ फैलाइएगा ।। मेरा देना ज्यों ऊँट के मुँह में जीरा , मैं दरवेश ख़ुद मुझसे क्या पाइएगा ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 390 – सात रंग न डाले

सात रंग तज रंग फ़क़त डाला काला ।। जिसमें आटा कम भरपूर नमक डाला ।। वो मेरा कैसे अपना हो सकता है , मेरी ऐसी क़िस्मत को लिखने वाला ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 389 – चिलग़ोज़ा , काजू

  चिलग़ोज़ा , काजू , बादाम से थोथा चना हुआ ।। आग-आग से धुआँ-धुआँ सा कोहरा घना हुआ ।। पूछ रहा है क्यों ? तो सुन ले सिर्फ़ोसिर्फ़ तेरे ; हाँ ! तेरे ही इश्क़ में ज़ालिम मैं यों फ़ना हुआ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 388 – वो चमकदार वो रोशन

वो चमकदार वो रोशन क्यों जुप ही रहता है ? सामने क्यों नहीं आता है लुप ही रहता है ? बात-बेबात-बात करना जिसकी आदत थी , क्या हुआ हादसा कि अब वो चुप ही रहता है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 387 – पलक झपकते भिखारी

( चित्र Google Search से साभार ) पलक झपकते भिखारी नवाब हो जाये ॥ सराब जलता हुआ ठंडा आब हो जाये ॥ सुना तो ख़ूब न देखा ये करिश्मा-ए-ख़ुदा , कि चाहे वो तो ज़र्रा आफ़्ताब हो जाये ॥ –डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्तक : 386 – पाऊँ यही कि सब हैं

पाऊँ यही कि सब हैं आम कोई भी न ख़ास ।। कैसा है कौन इसका जब लगाऊँ मैं क़ियास ।। बाहर से सब ढँके-मुँँदे , सजे-धजे हैं लेक , अंदर हैं आधे नंगे या पूरे ही बेलिबास ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more