दुश्मन का देख ठाठ-बाट जल रहा हूँ मैं ॥

वो अर्श पर उड़े ज़मीं पे चल रहा हूँ मैं ॥

गिरते नहीं गिराए से भी लोग जिस जगह ,

उस खुरदुरी ज़मीन पर फिसल रहा हूँ मैं ॥

जब तक लचक थी हड्डियों में मैं नहीं झुका ,

अब सख़्त हैं तो झुकने को मचल रहा हूँ मैं ॥

हालात ने कुछ इस तरह बदल दिया मुझे ,

हालात अपने आजकल बदल रहा हूँ मैं ॥

बेहाल हूँ मैं अपने दर्द से यहाँ-वहाँ ,

मारे खुशी के यों नहीं उछल रहा हूँ मैं ॥

औंधे पड़ों को और लात मारता जहाँ,

खा-खा उसी की लातें तो सँभल रहा हूँ मैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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