( चित्र Google Search से साभार )

चाहे वो कितने ऊँचे ही ब्राह्मण हों या हों आर्य ?

शिक्षक का सुनिश्चित है सबको विद्यादान कार्य ।।

यदि एकलव्य जैसे सभी ठानने लग जाएँ ,

हो जाएँगे औचित्यहीन सारे द्रोणाचार्य ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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