मुक्तक : 406 – मेरे सुलझाये ही मुझको Posted on December 20, 2013 /Under मुक्तक /With 0 Comments मेरे सुलझाये ही मुझको अब इक उलझन समझते हैं ।। मेरी उँगली पकड़ चलते हुए रहजन समझते हैं ।। किसी ने उनके तौबा-तौबा इतने कान भर डाले , मेरे पाले मुझे ही जान का दुश्मन समझते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति 113