कुछ बह्र की , कुछ जंगलों की आग बने हैं ॥

कुछ शम्अ , कुछ मशाल , कुछ चराग़ बने हैं ॥

वो तो बनेगा सिर्फ़ किसी एक का मगर ,

उसके फ़िदाई लाखों लोग-बाग बने हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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