बचपन में ही इश्क़ ने उसको यों जकड़ा ।।

चौदह में लगता बत्तीस से और बड़ा ।।

जो खाली लोटा न उठा पाता था कल ,

हाय ! उठाता है भर-भर वो आज घड़ा ।।

डॉ. हीरालाल प्रजापति

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