मुक्तक : 655 – सुंदरता को द्विगुणित करके

सुंदरता को द्विगुणित करके अलंकरण से ॥ चलती जब वह हौले-हौले कमल चरण से ॥ यदि अति कायर भी उसके संग को तरसता , फिर उसको पाने वो डरता नहीं मरण से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

गीत (13) : उस कोमल में अति दृढ़ता है ॥

उस कोमल में अति दृढ़ता है ॥ जीवन के प्रति इक उत्कटता । है उसमें अद्भुत जीवटता । नीलगगन के स्वप्न लिए वो – बिन सीढ़ी ऊपर चढ़ता है ॥ उसका हाथ न कोई पकड़ता । स्वयं ही गिर फिर उठ...Read more

मुक्तक : 654 – दुर्गंधयुक्त स्वेद

दुर्गंधयुक्त स्वेद भी गुलाब इत्र था ।। सच थूक भी उसे मेरा कभी पवित्र था ।। दिखती थी रश्मिपुंज मेरी कालिमा उसे , जब वो कभी मेरा अभिन्न इष्ट मित्र था ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

गीत (12) : उनको मैं असफल लगता हूँ ॥

उनको मैं असफल लगता हूँ ॥ गमले से जो खेत हुआ मैं । उनके ही तो हेत हुआ मैं । हूँ संवेदनशील औ’ भावुक – पर उनको इक कल लगता हूँ ॥ जो बोले वो मैं कर बैठा । मरु में...Read more

गीत ( 11 ) : एक सिंहिनी हो चुकी जो भेड़ थी ॥

एक सिंहिनी हो चुकी जो भेड़ थी ॥ खुरदुरेपन में भी सच नवनीत थी । चीख में भी पहले मृदु संगीत थी । एक पाटल पुष्प की वह पंखुड़ी – दूब कोमल अब कंटीला पेड़ थी ॥ तमतमा बैठी अचानक...Read more

गीत (10) : फिर गये जब घूर के दिन ॥

फिर गये जब घूर के दिन ॥ चापने उसको लगे सब । चाटने उसको लगे सब । पास में आने से जिसके – कल तक आती थी जिन्हें घिन ॥ आँख का तारा हुआ है । सब का ही प्यारा...Read more