मुक्तक : 462 – कर लूँ गुनाह मैं भी

कर लूँ गुनाह मैं भी अगर कुछ मज़ा मिले ।। फिर उसमें भी हो लुत्फ़ जो मुझको सज़ा मिले ।। यों ही मैं क्यों करूँ कोई क़ुसूर कि जिसमें , बेसाख्ता हों होश फ़ाख्ता क़ज़ा मिले ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 461 – इक भी बेदिल से नहीं

इक भी बेदिल से नहीं सब ही रज़ा कर लिखिये ॥ लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ समझ-सोच-बजा कर लिखिये ॥ डायरी ख़ुद की कभी आम भी हो सकती है , दिल के जज़्बात शायरी में सजा कर लिखिये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

115 : ग़ज़ल – आज तो कुछ भी नहींं

आज तो कुछ भी नहीं मुझसे छिपाया जाएगा ।। राज़-ए-दिल का बोझ अब ना और उठाया जाएगा ।।1।। मैं तमन्नाई नहीं राहें मेरी फूलों की हों , हाँ बिना जूतों के काँटों पे न जाया जाएगा ।।2।। हाथ भी जोड़े...Read more

मुक्तक : 460 – मैं बेक़सूर हूँ मैं

मैं बेक़सूर हूँ मैं गुनहगार नहीं हूँ ।। हरगिज़ किसी सज़ा का मैं हक़दार नहीं हूँ ।। चुभते हों जिनको फूल उनकी नाजुकी ग़लत , मैं नर्म-नर्म गुल हूँ सख़्त ख़ार नहीं हूँ ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 459 – आबे ज़मज़म समझ के

आबे ज़मज़म समझ के जह्र पिये जाता हूँ ।। बस ख़ुदा तेरी ही दम पे मैं जिये जाता हूँ ।। सख़्त से सख़्त है दुश्वार ज़िंदगी मेरी , नाम रट-रट के तेरा सह्ल किये जाता हूँ ।।       ( सह्ल...Read more

मुक्तक : 458 – बहुत सी पास में खुशियाँ

बहुत सी पास में खुशियाँ हों या इफ़्रात में हों ग़म ।। कि रेगिस्तान हो दिल में या क़ामिल आब-ए-ज़मज़म ।। है ज़ाती तज़्रुबा मेरा ये ज़ाती सोच मेरी , कि शायर की क़लम में तब ही आ पाता है दम-ख़म ।। -डॉ....Read more