( चित्र Google Search से अवतरित )

रोती-सिसकती क़हक़हों भरी हँसी लगे ॥

बूढ़ी मरी-मरी जवान ज़िंदगी लगे ॥

इक वह्म दिल-दिमाग़ पे है तारी आजकल ,

रस्सी भी साँप सी लटकती या पड़ी लगे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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